लखनपुर का कंजूस लखन | Moral Stories in Hindi | Hindi Story For Kids

लखनपुर का कंजूस लखन | Moral Stories in Hindi | Hindi Story For Kids
लखनपुर का कंजूस लखन

लखनपुरा का लखन अपनी कंजूसी के लिए मशहूर था। कुसुम की नई-नई शादी हुई थी लखन के साथ।

कुसुम: हम कब से आपको बोल रहे हैं कि घर में शौचालय बनवा दीजिए खेत में शौच के लिए जाना हमको बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।

लखन: बनवा तो दें पर बनवाने के लिए पैसे क्या तुम्हारे पापा देंगे।

कुसुम: हमारे पापा क्यों देंगे तुम हमको बिहा कर लाए हो तो तुम दो और अगर घर में शौच नहीं बनवाया तो बता देते हैं कि हम चले जाएंगे अपने मायके।

लखन: हां हां बनवा देंगे।।

लखन सोच में डूब गया कि कैसे वो घर में शौचालय बनवाए।

एक दिन वह अपने खेत में बैठा हुआ था।

लखन: हां कुसुम को बोल तो दिए हैं पर आखिर शौचालय बनाएंगे कैसे। शौचालय बनवाने में भी हजारों रुपए का खर्चा हो जाएगा।

वो सोच ही रहा था कि उसका ध्यान बगल वाले खेत के किनारे पर पड़ी एक पुरानी सिंटेक्स टंकी पर गया और वो उस खेत के मालिक के पास चला गया।

लखन: महादेव भैया ये जो सिंटेक्स की टंकी यहां पर पड़ी है ये आपकी कोई काम की है क्या।

महादेव भैया: नहीं लखन वो टंकी टूटी फूटी हुई है भला वो मेरे किस काम आएगी।

लखन: तो हम ले जाएं क्या।

महादेव भैया: हां पर तुम इसका करोगे क्या।

लखन: वो आप देखते रहिए कि हम क्या करेंगे।

लखन वो पूरी सिंटेक्स की टंकी लेकर अपने घर आ गया। पूरा दिन उसने उस टंकी पर काम किया और उसके अंदर शौचालय बना दिया।

लखन: अरे ओ कुसुम बाहर आओ जरा।

कुसुम: क्या बात है क्यों चिल्ला रहे हो आप।

लखन: ये देखो तुम्हारा शौचालय।

सिंटेक्स की टंकी के अंदर बना शौचालय देखकर कुसुम दंग रह गई उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहें।

लखन: अब बेफिजूल बकर बकर ना करना शौचालय को लेकर।

लखन का ये जुगाड़ू शौचालय पूरे गांव में फेमस हो गया। गांव वाले ये शौचालय देखने लखन के घर आने लगे।

मुखिया जी: वाह लखन तुमने तो सेंटेक्स की टंकी का अच्छा इस्तेमाल किया।

लखन: और नहीं तो क्या कौन कहता है सारी पुरानी चीजें कबाड़ ही होती है।

मुखिया जी: वाह लखन वाह।

गांव वालों ने लखन की प्रशंसा क्या की उसने ये बात दिल पर ले ली और वो और भी ज्यादा कंजूस बन गया।

कुछ सालों बाद लखन को एक बेटा पैदा हुआ।

लखन: अब गांव वालों को मिठाई कौन खिलाएगा। मिठाई खिलाना तो पड़ेगा ना मेरे काफी पैसे बर्बाद हो जाएंगे क्या करूं क्या करूं मैं।

वो सोच ही रहा था कि उसने देखा कि उसके खेत में कद्दू उगे थे और बस लखन को पैसे बचाने का रास्ता मिल गया।

मुखिया जी: अरे लखन तुझे तो बेटा हुआ है कम से कम पेड़े या लड्डू तो बटवा दे।

लखन: अब क्या बताऊं मुखिया जी बच्चे के पैदा होने से पहले देवी मां हमारे सपने में आई थी और हमको आदेश दिया कि बेटा हो या बेटी तू खुद पेठा बनाकर गांव वालों में बांटना और हम तब से देवी मां की आज्ञा का पालन किए हैं।

मुखिया जी: ठीक है लखन हम सब समझ गए।

मुखिया जी और गांव वाले समझ गए की लखन ने कंजूसी में पेड़े के बदले पेठे बैठे हैं। लखन हर जगह कंजूसी करता था खैर सालों बीते और लखन के दो बच्चे हो गए।

कुसुम: हमको होटल में खाना खाना है।

लखन: अब ये क्या नया आ गया।

कुसुम: मेरी सारी सहेलियां महीने में दो बार चाइनीस खाने होटल जाती हैं और एक हम हैं जो हमेशा घर का ही खाना खाते हैं। हम बता देते हैं कि आप अगर हमें चाइनीस खिलाने नहीं ले गए तो हम मायके चले जाएंगे।

लखन: यह क्या बार-बार मायके चले जाने की रट लगाई बैठी हो तुम ले जाएंगे कल हम तुम्हें चाइनीस खिलाने ठीक है।

अगले दिन लखन, बड़ा बेटा चंदन, छोटा बेटा नंदन और कुसुम चारों एक ही बाइक पर निकल गए।

कुसुम: अभी तो नंदन छोटा है हमारी गोद में बैठा है जब बड़ा हो जाएगा तो कैसे इसे फटफटी पर बैठेंगे।

लखन: तब का तब सोच लेंगे अभी तो तुम चाइनीस खाने का सोचो।

जैसे तैसे सारा परिवार चाइनीस रेस्टोरेंट पहुंचा।

कुसुम: हम नूडल्स खाएंगे।

बड़ा बेटा चंदन: हम भी नूडल्स खाएंगे।

लखन: ओ भाई साहब दो हाफ नूडल्स और एक हाफ फ्राइड राइस ले आओ।

वेटर आर्डर लेकर चला गया।

कुसुम: दो हाफ नूडल्स क्यों बोले उसके बदले एक फूल ही बोल देते।

लखन: तुम भुक्कड़ की भुक्कड़ ही रहोगी। दो हाफ में एक फूल से ज्यादा नूडल्स मिलता है समझ गई।

कुसुम: मुझे क्या पता आप हमें कब चाइनीस खिलाने लाए हो।

लखन: अब ले आया हूं ना तो समझ जाओ।

सभी लोगों ने चाइनीस खाया और फिर उसी फटफटी पर बैठकर घर चले गए लेकिन उस दिन से लखन सोचने लग गया कि जब नंदन बड़ा होगा तो वो फटफटी पर कैसे बैठेगा।

खैर सालों बीत गए और नंदन बड़ा हो गया और अब लखन को सोचना पड़ गया।

मुखिया जी: क्या हुआ लखन बड़ी गंभीर सोच में डूबे हो।

लखन: क्या बताएं मुखिया जी मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा है।

मुखिया जी: पर हुआ क्या।

लखन: अब हम अपने दोनों बेटे और पत्नी को एक साथ अपनी फटफटी पर कैसे बैठाएंगे।

मुखिया जी: अब तुम्हारा परिवार बड़ा हो गया है अब तुमको तो नई कार ही खरीदनी पड़ेगी।

लखन: नहीं-नहीं मुखिया जी हम इतने पैसे बर्बाद नहीं कर सकते उससे तो अच्छा है हम नंदन को कुर्सी पर बैठा दें।

लखन को आईडिया मिल गया वो सीधे कबाड़ की दुकान पर गया और वहां उसने पुरानी व्हीलचेयर खरीद ली।

लखन ने खुद मेहनत करके उस पुरानी व्हीलचेयर को अपनी फटफटी से जोड़ दिया।

लखन: अरे कुसुम इधर आओ जल्दी।

कुसुम: क्या है क्यों चीख रहे हो इतना।

लखन: तुम पूछ रही थी ना हम नंदन को फटफटी पर कैसे बैठाएंगे तो ये देखो हमारा आईडिया।

फटफटी के पीछे जुड़ी व्हीलचेयर देखकर कुसुम की आंखें फटी की फटी रह गई। एक बार फिर कुसुम लखन के जुगाड़ से हक्का बक्का रह गई और उस दिन से लखन और उसका परिवार अपनी जुगाड़ू फटफटी पर गांव भर घूमने लगा।

मुखिया जी: अरे लखन ये क्या है।

लखन: हमारी कुर्सी की सवारी।

मुखिया जी: बढ़िया है बढ़िया।

कुर्सी की सवारी देखकर सारा गांव हंस रहा था पर लखन तो लखन था वो पैसे बचा कर बहुत खुश था।